विद्याज्ञान छात्रवृत्ति

विद्याज्ञान छात्रवृत्ति

vidyagyan

यह कार्यक्रम उपेक्षित और अल्पसंख्यक समुदायों की छठी से दसवीं कक्षा तक की बालिकाओं पर केंद्रित एक छात्रवृत्ति कार्यक्रम है जो उनके स्कूल में बने रहने और सीखने की क्षमता को विकसित करने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करता है। यह कार्यक्रम जीवन के उन पहलुओं की पहचान करता है जहाँ अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए छात्रों को सहायता की जरूरत होती है और इसके बाद उनके हितों और जीविका विकल्पों को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत विकास योजनाओं विकसित करता है।

संस्थापन ने श्री शिवसुब्रमण्य नादर एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से वर्ष 2007-08 में इस कार्यक्रम की शुरुआत की। वाराणसी, रायबरेली और बाराबंकी जिलों में 10 साथी संगठनों के माध्यम से इसे लागू किया गया और वर्तमान में हम 1,860 बालिकाओं तक पहुँचे हैं।

 

हमें प्रेरित करनेवाली कहानियाँ

 

 

जूली का जन्म श्री पन्ना लाल और श्रीमती लालमणि देवी के घर 15 जून,1996 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता एक गरीब बुनकर थे जिनकी आय इतनी कम थी कि परिवार का गुजारा भी नहीं होता था। उनकी माँ एक नौकरानी के रूप में पास के एक स्कूल में काम करती थी जिससे उनके छोटे परिवार के गहरे वित्तीय संकट में कोई विशेष मदद नहीं मिल पाती थी। इसके चलते जूली की बड़ी बहन को पाँचवी कक्षा के बाद स्कूल छोड़नी पड़ी। इधर जूली भी बड़ी हो रही थी और साथ ही उनके भविष्य के संकट भी बढ़ रहे थे। परिवार की बिगड़ती वित्तीय स्थिति के कारण उनकी स्कूली पढ़ाई दाव पर लगी थी।

जैसा कि ऐसे बच्चों के साथ होता है, उनके पिता ने पाँचवी कक्षा के बाद उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए दबाव डाला। जूली बचपन से ही मेधावी और मेहनती छात्रा रही थीं। विज्ञान के सिद्धांतों और गणित के फार्मूलों में उनकी गहरी रुचि थी। वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं, लेकिन माता-पिता की आय बहुत कम होने की वजह से यह मुश्किल होता जा रहा था। लेकिन इसी दरम्यान विद्याज्ञान छात्रवृत्ति उनके लिए एक वरदान बनकर आया। जूली को जब इस छात्रवृत्ति के लिए चुना गया तब वह छठी कक्षा में थीं। छात्रवृत्ति मिलने के बाद अब उनके पिता के पास इसके सिवा अब कोई विकल्प नहीं था कि वह अपनी बेटी को पढाई पूरी करने दें। अब उन्हें अपना भविष्य साफ-साफ दिखाई दे रहा था और इससे वह बहुत खुश थीं। छात्रवृति में मिलनेवाले पैसे का इस्तेमाल जूली अपने स्कूल की फीस भरने और पोशाक और किताबें खरीदने के लिए करती हैं। वह कहती हैं, "छात्रवृत्ति मिलने से पहले स्कूल की फीस भरने में हमेशा देरी हो जाती थी, लेकिन अब यह समय दे दिया जाता है।" स्कूल के अलावा अब वह कोचिंग भी लेती हैं जहाँ गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और सामान्य ज्ञान सीखने से उन्हें अपनी पढ़ाई में मदद मिलती है। अपनी पढ़ाई में सहायता के लिए वह विद्याज्ञान छात्रवृत्ति की बहुत आभारी हैं और उनकी प्रबल इच्छा है कि वह आगे भी लगातार अपनी पढ़ाई जारी रखें।

जूली

मारिया वारसी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं और परिवार के लिए दो जून की रोटी भी उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं। मनुष्य अपनी बुनियादी जरूरतों- भोजन, वस्त्र और आवास पूरा करने के लिए कमाता है। इन जरूरतों को पूरा करने के बाद ही वे शिक्षा जैसी गौण चीजों में अपनी आय का निवेश करते हैं। लेकिन बाराबंकी जैसे छोटी जगहों में परिवारों की मानसिकता अभी भी यही है कि लड़की को पढ़ाना-लिखाना जरूरी नहीं है। मारिया के पिता मोहम्मद शफीक और माता सूफिया खान का रिश्ता तनावपूर्ण रहा और इसके चलते वे अलग-अलग रहते थे। मारिया और उसकी छोटी बहन अपनी माँ के साथ ही रहते थे। माँ को काम मिलता नहीं था, सो वह परिवार के लिए खाना भी मुश्किल से जुटा पाती थीं। अपनी माँ की इतनी कम आय और कुछ खास महीनों में ही काम मिल पाने की वजह से मारिया का पढ़ने-लिखने का सपना पूरा होता नहीं दीख रहा था। लेकिन उनकी माँ ठोस इरादे की थीं और उन्होंने पास के ही एक प्राइमरी स्कूल में उनका दाखिला करा दिया जहाँ उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की। पढ़ने और लिखने के प्रति उनके मन में बहुत उत्साह था। लेकिन पढ़ने-लिखने का उनका सपना टूटने के कगार पर आ गया जब परिवार की माली हालत इतनी खराब हो गई कि उनकी पढ़ाई का खर्च जुटाना मुश्किल हो गया। अब इसे इस नन्हीं सी लड़की का सौभाग्य कहें या किसी की दुआओं का असर कि उन्हें विद्याज्ञान छात्रवृत्ति के लिए चुन लिया गया। इस वज़ीफ़े के तहत उन्हें विभिन्न विषयों की निःशुल्क कोचिंग दी गई। इसके अलावा उन्हें अपने स्कूली खर्चों के लिए भी हर महीने 500 रुपये की सहायता अलग से दी गई। मारिया की माँ हमेशा ही अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित रहती थीं। लेकिन विद्याज्ञान के तहत मिलने वाले वज़ीफ़े ने मारिया के भविष्य के बारे में सोचने के लिए उनका हौसला बढ़ाया। इस छात्रवृत्ति ने मारिया के संकल्प को और दृढ़ कर दिया। अब मारिया भी अपनी पढ़ाई में अव्वल बनने के लिए कोचिंग और घर में अथक मेहनत करती हैं। वह अपनी कक्षा के सर्वश्रेष्ठ छात्रों में से एक है और उनके सहपाठी भी मदद के लिए उनकी ओर देखते हैं। वह खुद भी एक शिक्षक बनना चाहती हैं और वंचित बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना चाहती हैं। वह नहीं चाहतीं कि किसी भी बच्चे को पैसों की कमी की वजह से अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़े। अपनी बेटी के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए उनकी माँ ‘बेटी फाउंडेशन’ और राजीव गांधी संस्थापन की आभारी हैं।

मारिया वारसी