वंडरूम

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वंडरूम

Wonderoom Rajiv Gandhi Foundation - image2‘वंडरूम’ की संकल्पना 2011 में ऐसे अभिनव प्रयोगशाला और केंद्र के रूप में की गई जो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया का अध्ययन कर इसमें योगदान दे सके। वंडरूम की गतिविधियाँ इस तरह से डिजाइन की गईं जिससे बच्चों के लिए सीखने की प्रक्रिया दिलचस्प और आकर्षक बने। वह बच्चों को अपने स्वयं के जीवन से जुड़ी हुई लगे। आसपास के स्कूलों में बाल केंद्रित परियोजनाओं को लागू करने के लिए वंडरूम ने स्थानीय निकायों, जैसे- नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) के साथ सहयोग कायम किया है। समय के साथ-साथ वंडरूम एक ऐसे अभिनव पुस्तकालय में विकसित हो गया जो विभिन्न सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों को 5,000 से भी अधिक पुस्तकों की दुनिया में खोज करने के लिए प्रोत्साहित करती है। बच्चे और भी कई गतिविधियों, जैसे- पुस्तक-वाचन, कथावाचन, क्लब, समर कैम्प, थिएटर, संगीत और विज्ञान की मज़ेदार गतिविधियों आदि की कार्यशालाओं में भी भाग लेने लगे हैं। 300 से भी अधिक बच्चे और माता-पिता इस द्विमासिक वंडर कार्यक्रमों में भाग लेते हैं जहाँ बच्चे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। वंडरूम जवाहर भवन में स्थित है और प्रतिदिन 10 बजे सुबह से 7 बजे शाम तक खुली रहती है।
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हमें प्रेरित करनेवाली कहानियाँ

 

दीपक कुमार का जन्म 23 अक्टूबर, 2003 को सुरेश कुमार नाम के एक ऑटो चालक और फूल कुमारी के घर हुआ था। दीपक तीन भाई-बहन हैं जो 21-ए, जनपथ, नई दिल्ली में रहते हैं। वह कई सालों से नियमित रूप से वंडरूम आते रहे हैं। वह अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "मैंने अपने इलाके के कुछ बच्चों को कागज का मोर बनाते हुए देखा। बाद में, उन्होंने मुझे वंडरूम नाम के एक जगह के बारे में बताया जहाँ इस तरह की चीजें मुफ्त में सिखाई जाती हैं। नई चीजें सीखने की लालसा में उन्होंने वंडरूम में शामिल होने के लिए अपनी माँ से अनुमति मांगी। ज्यादा खर्च के डर से उनकी माँ ने इससे मना कर दिया। अगले दिन वह अपने दोस्तों के पास वापस गए और इसमें लगनेवाली फीस के बारे में पूछा। जब उन्हें पता चला कि इसमें कुछ भी पैसा नहीं लगता तो वे बहुत खुश हुए। दीपक के वंडरूम आने का एक उद्देश्य यह भी था कि वह स्कूल की कक्षाओं में पढ़ाए जानेवाली चीजों से कुछ आगे की चीज जानना चाहते थे। पूछने पर उन्होंने विज्ञान में अपनी रुचि के बारे में बताया। यह बताते हुए उनकी हँसी छूट जाती है कि घर की में बिजली की सर्किट ठीक करने में उन्हें महारत हासिल है। और यही कारण है कि वह वंडरूम में चलने वाले ‘फन साइंस’ के सत्रों में काफी दिलचस्पी लेते हैं। फन साइंस का संचालन करनेवाले अश्विनी सर के आस-पास रहना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। इन सत्रों ने उन्हें अपनी पढ़ाई और स्कूल प्रोजेक्ट्स में भी मदद की है। वंडरूम के बारे में अपनी और पसंदीदा चीजें पूछे जाने पर स्वभाव से शर्मीले दीपक कहते हैं, "फन सेशन्स के बीच-बीच में अश्विनी सर जो अजूबी चीजें बताते हैं उसमें बहुत मजा आता है।"वंडरूम में कबड्डी, खो-खो और ‘कुत्ते और हड्डी’ का खेल अपने दोस्तों के साथ खेलना भी उन्हें बहुत पसंद है। सलमान खान के एक बड़ा फैन होने की वजह से नाटक और डांस में भी वह हिस्सा लेते हैं। फिलहाल वह नई दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित नवयुग स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रहे हैं। अपने खाली समय में उन्हें ड्राइंग और पेंटिंग करना भी पसंद है। यहाँ तक ​​कि उन्हें पौराणिक किताबें पढ़ने का भी शौक है और उनकी पसंदीदा किताब रामायण है। मुस्कुराते हुए वह कहते हैं, "मुझे सबसे ज्यादा हनुमान-II पसंद है!"।

दीपक कुमार

नेहा का जन्म 13 दिसंबर, 2001 को एक टैक्सी चालक देवेंद्र कुमार और उनकी पत्नी लता कुमार के घर हुआ। उनका जन्म तो गाजियाबाद में हुआ था, लेकिन जल्द ही वे 21-ए, जनपथ, नई दिल्ली में आ बसे और उसके बाद से यहीं रह रहे हैं। तीन भाई-बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। वर्ष 2013 में उन्होंने वंडरूम आना शुरू किया और तब से नियमित रूप से आने लगी हैं। जब उन्हें पहली बार वंडरूम के बारे में पता चला था तो वह एक बहुत ही छोटी सी लड़की थीं। एक दिन कॉलोनी में कुछ दोस्तों के साथ खेल रही थीं, तो उन्होंने बच्चों को वंडरूम के बारे में बात करते हुए सुना। वह याद करते हुए कहती हैं, "दीदी एक ऐसी जगह के बारे में बात कर रही थीं, जहाँ सैकड़ों किताबें थीं और सीखने की भी हज़ारों बातें थी।" नई चीजें जानने की उत्सुकता और सारी पुस्तकें पढ़ जाने के उत्साह में वह अपनी माँ को वह सब कुछ बताने के लिए वापस अपने घर दौड़ीं जो उन्होंने वंडरूम के बारे में सुना था। एक गरीब परिवार से आने की वजह से उनकी माँ को एक तो इसकी फीस ज्यादा होने का डर हुआ, और फिर उन्हें इस जगह की विश्वसनीयता पर भी शक था। नेहा मुस्कुराते हुए कहती हैं कि आखिरकार एक दिन उनकी माँ खुद इस जगह की पड़ताल करने आईं। जैसा कि उन्हें उम्मीद थी, वंडरूम ने सहज ही उनकी माँ का भरोसा भी जीत लिया! और इस तरह हँसी, खुशी और सीखने का सिलसिला शुरू हुआ। नेहा की पहले से ही अभिनय में रुचि थी और वंडरूम ने उनकी प्रतिभा को और निखारना शुरू किया। वंडरूम में आयोजित नाटकों के दौरान उन्होंने अभिनय के बहुत सारे गुर सीखे। अपना पसंदीदा सत्र पूछे जाने पर भी वह उत्साह के साथ कहती हैं, "ड्रामा, और क्या!"। वह रजनीश बिष्ट की तारीफ करते नहीं थकतीं और उन्हें एक रोल मॉडल की तरह देखती हैं। रजनीश बिष्ट वंडरूम में नाटक सत्र का संचालन करते हैं। श्री बिष्ट की भरपूर प्रशंसा जारी रखते हुए वह कहती हैं, "मुझे उनका सेशन बहुत पसंद है। मैं उनकी छोटी से छोटी सलाह भी अपने अभिनय में अपनाने की कोशिश करती हूँ। वह एक अद्भुत अभिनेता और निर्देशक हैं!" नाटक सत्रों के अलावा, नेहा को वंडरूम में बैठकर इतिहास की किताबें, खासकर विश्वयुद्धों के बारे में पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। उन्हें पिक्चर-बुक्स पढ़ना भी बहुत पसंद है। उन्हें लगता है कि स्कूलों की पढ़ाई और वंडरूम की पढ़ाई में जमीन-आसमान का फर्क है। वह इतिहास की ही पढ़ाई की मिसाल देते हुए कहती हैं, "स्कूलों में इतिहास की कक्षाएँ नीरस और बोझिल होती हैं; जबकि वंडरूम में अश्विनी सर उसी बात को ज्यादा जीवंत तरीके से बताते हैं। नेहा वंडरूम को एक ऐसे खजाने के रूप में देखती हैं जहाँ बच्चों को अपना व्यक्तित्व निखारने का अवसर मिलता है। अपने स्कूल और पड़ोस के कई बच्चों को उन्हें वंडरूम से जुड़ने की सलाह दी है। कालोनियों और स्कूलों में उन्होंने वंडरूम के कार्यक्रमों के पोस्टर भी लगाए हैं। "बच्चों को वंडरूम से जुड़ना चाहिए, नहीं तो वे जरूर ही कुछ ऐसा मिस करेंगे जो उन्हें मिलना चाहिए।" अभी वह मंदिर मार्ग पर स्थित नवयुग स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ रही हैं और अपने खाली समय में थोड़ा अभिनय और डांस इत्यादि करना उन्हें बहुत अच्छा लगता है।

नेहा कश्यप