राहत एवं पुनर्वास

राहत एवं पुनर्वास

relief_rehabiliation
प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाएँ दुनिया भर में जान और माल के नुकसान का एक प्रमुख कारण हैं। भारत भी सूखा, लू की लहर, बाढ़, आंधी-तूफान और भूकंप जैसी कई प्रकार की आपदाओं का शिकार रहा है। 2015 में देश में प्राकृतिक आपदाओं की 19 घटनाएँ हुईं जिससे सरकारी खजाने पर 3 अरब डॉलर से अधिक का बोझ पड़ा। दुनिया भर में बाढ़ से प्रभावित लोगों का लगभग 60 प्रतिशत (16.4 लाख) लोग भारत में थे। दूसरी ओर दंगों और अन्य हिंसक घटनाओं जैसी आपदाओं से भी हर वर्ष सैकड़ों मौतें और भारी आर्थिक क्षति होती हैं।

देश भर में आपदाओं के दौरान राहत और पुनर्वास सहायता प्रदान करने का राजीव गांधी संस्थापन एक लंबा इतिहास रहा है। संस्थापन ने 1991 में उत्तरकाशी के भूकंप प्रभावित क्षेत्र में अपना पहला राहत कार्य किया था। 1992 के दंगों के दौरान संस्थापन ने स्वैच्छिक संगठनों के सहयोग से तिरपाल, कंबल, दवाइयां और खाना पकाने के बर्तन सहित कई प्रकार की राहत सामग्रियाँ बाँटीं। संस्थापन गुजरात में हुए दंगों से प्रभावित बच्चों की पहचान कर और उनकी शिक्षा के लिए सहायता मुहैया कराई। उसी वर्ष उग्रवाद प्रभावित बड़गाम जिले में परिवारों के मनोसामाजिक सहायता प्रदान की गई।

सितंबर, 2014 में जम्मू और कश्मीर विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ गया। 280 से अधिक लोगों की जान चली गई और लगभग 6 लाख लोग बेघर हो गए। लगभग 400 गांव बाढ़ के पानी में बुरी तरह डूबे गए और महामारी फैलने का डर भी छाया हुआ था। सर्दियों की शुरुआत ने बेघर लोगों के लिए परिस्थिति को और बदतर बना दिया। आपदा के बाद फौरी राहत उपलब्ध कराके संस्थापन ने कश्मीर के पांच बाढ़ प्रभावित जिलों- अनंतनाग, बांदीपुरा, बारामूला, बड़गाम और श्रीनगर में राहत कार्यों को अंजाम दिया। लोगों और सामग्रियों को एकजुट करने और सीधे समुदायों तक पहुँचने जैसे प्रयासों के जरिए लगभग 5000 परिवारों को उनके दरवाजे पर राहत सामग्री मुहैया कराई गई। संस्थापन के चिकित्सा दल ने 9000 से अधिक रोगियों का इलाज किया और उन्हें मुफ्त दवाइयां प्रदान की। ठंड से प्रभावित लोगों को बचाने के लिए लगभग 1,200 कंबल और ऊनी कपड़े बाँटे गए। बाढ़ में फँसे लोगों को प्रतिदिन तीन समय का भोजन प्रदान करने के लिए संस्थापन ने मुफ्त लंगर भी चलाए। प्रभावित क्षेत्रों में आरओ आधारित संयंत्र लगाकर शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के भी प्रयास किए गए।

नवंबर 2014 में भारी बारिश से मेघालय के खासी और गारो पहाड़ियों में रहने वाले जनजातियों के घरों को गंभीर क्षति पहुँची। बकडिल नाम के एक स्थानीय एनजीओ के सहयोग से संस्थापन ने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों को अंजाम दिया। बारिश से प्रभावित लोगों को दवाइयाँ, ऊनी कपड़े और राहत सामग्रियाँ प्रदान की गईं।