ट्रांसफॉर्म स्कूल

ट्रांसफॉर्म स्कूल

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कई अन्य देशों की तरह ही भारत ने भी शिक्षा का वही मॉडल अपनाया है जिसमें साक्षरता और अंकगणितीय कौशल पर बहुत जोर दिया जाता है। शिक्षा का मौजूदा प्रतिमान अधिकाधिक सूचनाओं को दिमाग में भरने और उसे ज्यों का त्यों दोबारा प्रस्तुत कर देने को ही बच्चे की क्षमता और बुद्धि का पैमाना मानते हैं। मौलिक परिवर्तन केवल तभी आएगा जब शिक्षा या सीखने की प्रक्रिया को ही नए सिरे से परिभाषित किया जाए।

एक शैक्षणिक सिद्धांत की दृष्टि से देखा जाए तो अपने लिए ज्ञान की खोज और उसका सृजन करने के लिए छात्र को सक्षम बनाने का वातावरण तैयार करना सक्षमकारी शिक्षा का एक अभिन्न पहलू है। ऐसा वातावरण तैयार करने के लिए यह आवश्यक है कि बच्चे सार्थक ज्ञान से अपने स्वयं के अनुभवों को जोड़ने लगें। शिक्षा प्रभावी तरीके से तभी हो पाती है जब वह बच्चे के संदर्भ से ही विकसित और अपनी प्रकृति में परिवर्तनकारी होती है। शिक्षा के परिवर्तनकारी दृष्टिकोण का उद्देश्य ऐसा होना चाहिए जिससे बच्चे के सीखने की क्षमता में उनकी उत्सुकता और आत्मविश्वास का निर्माण हो। यह बच्चे की उस योग्यता को विकसित करे जो सीखने की प्रक्रिया में सहायक होता है। री

ऊपरोक्त समझ के आधार पर संस्थापन ने 2012 में ‘ट्रांसफॉर्म स्कूल’ नाम के कार्यक्रम की शुरुआत की। इस कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में विभिन्न संकुलों के या कुछ मामलों में ब्लॉक के सरकारी स्कूलों को उनके शिक्षण-कला को बदलने और अध्यापन की नई क्षमात पैदा करने के लिए सहायता दी गई ताकि शिक्षण बाल-केंद्रित बने। शैक्षणिक दृष्टिकोण में निम्नलिखित महत्वपूर्ण परिवर्तन लाए गए:

  • पढ़ाना नहीं, बल्कि सहयोगी भी होना: शिक्षकों को केवल पढ़ाने के अपने रवैये से आगे जाकर एक व्यापक और ज्यादा सशक्त तरीका अपनाना पड़ेगा और वह है कि बच्चे के सीखने की प्रक्रिया में सहयोगी या सुविधाकारी की भी भूमिका निभाएँ।

  • अनुभवात्मक शिक्षण के लिए बहुआयामी शिक्षण का वातावरण बनाना: बच्चे बहुआयामी शिक्षण सत्रों में शामिल होते हैं जो उनमें सीखने की विभिन्न योग्यताओं से उनका परिचय कराते हैं और उनमें ये क्षमताएँ विकसित करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित भी करते हैं; इस प्रक्रिया के माध्यम से बच्चों को अपनी समझ का प्रदर्शन करने के कई अवसर मिले और अपनी क्षमताओं का उपयोग करने और उसे और भी विकासित करने का भी अवसर मिले।

  • अध्याय नहीं, अवधारणाएँ: बच्चों ने उन अवधारणाओं के माध्यम से सीखा जो उनके पाठ्यक्रम में दिए गए सामग्री से तैयार किया गया था; अवधारणाओं की यह मैपिंग कक्षा-5 तक के लिए की गई।

  • क्षमताओं का सतत और व्यापक विकास: एक ऐसी मूल्यांकन प्रणाली जो क्षमताओं के एक व्यापक और विभिन्न प्रकारों पर ध्यान देता है। इसमें बच्चों को नियमित रूप से फीडबैक प्रदान किया जाता है

संस्थापन ने शिक्षकों और शिक्षक पर्यवेक्षकों के लिए क्षमता निर्माण की दिशा में सहायता प्रदान की और स्कूल स्तर पर योजना और संसाधन के मद में भी सहायता प्रदान की। राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर शिक्षा विभागों की सक्रिय भागीदारी और सहमति के साथ कार्यक्रम को लागू किया गया।

‘ट्रांसफॉर्मेटिव लर्निंग’ की यह परियोजना आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, छत्तीसगढ़, मेघालय, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 900 से अधिक स्कूलों तक पहुँची। संकुलों का विवरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है:

राज्य जिला क्लस्टर संख्या क्लस्टर के नाम
आंध्र प्रदेश महबूबनगर
चित्तूर
विशाखापत्तनम
3
2
3
गट्टू, पड़कल, धरूर
कार्वेटिनगर, शांतिपुरम्
रेगल्लु, पुड़िमड़क्का, जोलापुट
बिहार जहानाबाद
मधुबनी
2
1
नवाबगंज, जमनबीघा
सिमरी
छत्तीसगढ़ बस्तर
महासमुंद
3
3
इरिकपाल, बोरपादर, पाहुरबेल
संकरा, बी.के. बेहरा, खट्टा
मेघालय नॉर्थ गारो हिल्स

 

 

ईस्ट खासी हिल्स

22

 

 

 

14

थोरिका, डमास, डारम, थापा, आचोतचोंगरी, वारमग्रे, गाजिंगपारा, कोसीचेरा, नेंग्सा वाक्सो, डाइनाडुबी, मोंगपांगरो, गोसिंगपिटा, न्यू हारिंगकाटा, गोकोल, बेकबेकग्रे, मियापोरा, गांबिल आगा, बोलसोन, बाजेंगडोबा, थापा बिश्रामपुर, सोंगमेगाप, रेसुबेलपारा

 

5th माइल, नोंग्क्शे, फुड़मुरी, मॉसियात्खनम, नोंगसिलियांग, राइनजा, नोंगमायनसोंग, मॉपैट, नोंगक्वार, मदन इंग स्येम, मॉक्रिआ, मदनरायटिंग, मॉमिह, रैंगबिहबिह

उत्तराखंड देहरादून
बागेश्वर
नैनीताल
चमोली
1
1
1
1
जीवनगढ़
गलाई
नाथुआखान
उरगाम
उत्तर प्रदेश अमेठी
रायबरेली
बरेली
चित्रकूट
बहराइच
लखनऊ
बाराबंकी
सुल्तानपुर
गाजीपुर
कानपुर देहात
5
4
2
2
2
2
2
2
2
2
कोहार, पनियाहर, सरमय, कोरारी हीर शाह, ब्रामनी
बिरनावा, कानोली, खजूरी, गौरा
सरदार नगर, नगरिया विक्रम
कापसेठी, असोहा
भमबोरा, बडरौली
खुशहालगंज, बंथरा
जहाँगीराबाद, हरक डेकहा
मिश्रापुर, हेमनापुर
गहमर, सराय गोकुल
नोनापुर, रतनपुर

ये प्रक्रियाएँ जिला, ब्लॉक और संकुल (क्लस्टर) स्तर के 350 पदाधिकारियों, 903 प्रधानाध्यापकों, 1500 शिक्षकों और 12 गैर-सरकारी संगठनों के 96 क्लस्टर फैसिलिटेटर तक पहुँचीं। इन प्रयासों को 50,000 बच्चों के बोलने, लिखने, पढ़ने और सामाजिक कौशल बढ़ाने पर केंद्रित किया गया।