राजीव गांधी एक्सेस टू ऑपॉर्च्यूनिटीज़ प्रोग्राम

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राजीव गांधी एक्सेस टू ऑपॉर्च्यूनिटीज़ प्रोग्राम

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विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में 6 करोड़ से अधिक लाख लोग विभिन्न प्रकार की निःशक्तता के साथ जीवन जीते हैं। निःशक्तजनों को विभिन्न प्रकार की सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है जिसमें शिक्षा, रोजगार, पुनर्वास की सुविधा और अन्य बुनियादी सेवाओं की पहुँच भी शामिल है। बड़े पैमाने पर सामाजिक कलंक भी उनकी सामाजिक और आर्थिक दशाओं में बाधा उत्पन्न करने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में निःशक्तजनों की संख्या 2 करोड़ 68 लाख है जिनमें से लगभग 1 करोड़ 50 लाख पुरुष और 1 करोड़ 20 लाख महिलाएँ हैं। जनगणना के आँकड़ों से यह भी पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में निःशक्तजनों की संख्या अधिक है। निःशक्तजनों में से अधिकांश लोग (20.3%) चलने-फिरने में असमर्थ होते हैं। इसके बाद श्रवणता विकार (18.9%), दृष्टिहीनता (18.8%) और मानसिक रुग्णता और निःशक्तता (5.6%) आदि दोष आते हैं।

राजीव गांधी संस्थापन का विश्वास है कि किसी शारीरिक रूप से निःशक्त व्यक्ति की गतिशीलता बढ़ जाने से शिक्षा और रोजगार के अवसरों तक उनकी पहुँच भी बढ़ जाती है। इसी विश्वास के आधार पर प्रतिष्ठान ने 1992 में ‘राजीव गांधी एक्सेस टू ऑपॉर्च्यूनिटीज़’ (आरजीएटीओ) कार्यक्रम की शुरुआत की। इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिष्ठान युवा निःशक्तजनों को विशेष रूप से डिजाइन किए गए वाहन प्रदान करता है। 1992 से आज तक संस्थापन ने 25 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों के 2,600 से ज्यादा निःशक्तजनों को सहायता प्रदान किया है ताकि वे उच्च शिक्षा, रोजगार के अवसर और वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त कर सकें और समाज में गरिमा और सम्मान हासिल कर सकें। आरजीएटीओ परियोजना को कॉर्पोरेट संगठनों और सरोकारी व्यक्तियों से भी जबरदस्त सहयोग प्राप्त हुआ है।

चयन के लिए दिशा-निर्देश:

  1. उम्र: 18-35
  2. आय: 3,500-10,000 रुपये प्रति माह
  3. निःशक्तता का स्तर : 60% या इससे अधिक
  4. निचले अंगों की निःशक्तता लेकिन ड्राइव करने की क्षमता वाले
  5. किसी अधिकृत विभाग या एजेंसी से निःशक्तता प्रमाण पत्र
  6. अतीत में यह सहायता प्राप्त नहीं किए हों

निम्निलिखित व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती

  1. छात्र
  2. महिलाएँ
  3. जिनके परिवार में और भी सदस्य निःशक्त हों
  4. ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोग
  5. जिनके पास कोई सरकारी नौकरी नहीं है

 

विशेष रूप से तैयार वाहन के लिए आवेदन पत्र

प्रिय आवेदक,

हम वर्ष 2017 के लिए आपका आवेदन पत्र प्राप्त कर हर्षित हुए । आपका धन्यवाद !

20 अगस्त को राजीव गांधी फाउंडेशन नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में कुल 5077 आवेदकों में से चुने गए सौ आवेदकों को विशेष रूप से निर्मित वाहन से सम्मानित किया गया। उनको हमारी बहुत बहुत शुभकामनाएं।

नया आवेदन जनवरी 2018 में किया जायेगा। हम आपके आवेदन की प्रतिक्षा करेंगें । कृपया हमारी वेबसाइट पर आएं www.rgfindia.org

शुभकामनाएं !
 

 

हमें प्रेरित करनेवाली कहानियाँ

 

30-वर्षीय अमजद खान का जन्म 4 जुलाई, 1980 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में हुआ था। 1981 में वह नौ महीने के थे, जब वह पोलियो का शिकार हो गए। वाहन प्राप्त करने से पहले के अपने जीवन का अनुभव हमें बताते हुए वह एकबारगी स्तब्ध हो गए। उन्होंने कहा कि किस तरह एक स्थान से दूसरे स्थापन तक यात्रा के दौरान उन्हें सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ता था। उनके आसपास के लोग न केवल उनपर तरस खाते थे, बल्कि उन्हें हँसी का पात्र तक बना दिया था। यहाँ तक ​​कि एक बच्चे के तौर पर उन्हें अपने दैनिक कामकाज में कठिनाई का सामना करना पड़ता था। लेकिन गर्मी के महीने में एक ऐसा दिन भी आया जो अपने साथ अमजद के लिए बहुत सारी उम्मीदें और खुशियाँ लेकर आया। किसी तरह उन्हें राजीव गांधी संस्थापन के ‘एक्सेस टू ऑपॉर्च्यूनिटीज़’ कार्यक्रम के बारे में पता चला और इसके कुछ महीनों के भीतर ही वाहन उनके हाथों में था। यह तो उनकी आगामी उपलब्धियों की एक झलक भर थी। वाहन मिलने के बाद उन्होंने अपना एम.ए. पूरा किया। घर से कॉलेज के बीच की 20 किमी की दूरी का सफर अब आसानी से पूरी हो जाती थी। इस वाहन का सबसे बड़े फायदे के बारे में पूछे जाने पर वह गर्व से कहते हैं, "स्वायत्तता।" आज वह ह्यूमन एबिलिटी फाउंडेशन में सचिव के पद पर कार्यरत हैं। इसके अलावा वह स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (एसआईओ) के एक सदस्य भी हैं। साल भर पहले खुद के द्वारा शुरू किए गए एक ट्रस्ट के वे महासचिव भी हैं। इस ट्रस्ट के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने गर्व से इसके लक्ष्यों और उद्देश्यों के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य वंचित लोगों का उत्थान करना है। यह ट्रस्ट लोगों के बीच निःशक्तजनों के बारे में जागरूकता भी पैदा करता है। इसके अलावा अमजद 40-45 बच्चों को निःशुल्क पढ़ाते भी हैं। ऐसे माता-पिता जो अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते वे अपने बच्चों को अमजद खान द्वारा चलाए जानेवाले कक्षाओं में भेजते हैं। वह नोएडा स्थित नोडल एकेडमी स्कूल में एक शिक्षक के रूप में भी काम करते हैं।

अमजद खान

तीन-वर्षीय बच्चे रति नाथ के लिए 1993 एक मुश्किलों भरा साल था, जब उन्होंने एक बुखार में अपना पैर खो दिया। उनके परिवार ने कभी सोचा भी नहीं था कि महज एक बुखार उनके बेटे को चलने-फिरने में असमर्थ बना सकता है। डॉक्टरों के पास लगातार दौड़ना भी व्यर्थ साबित हुआ और इससे परिवार की आय भी कम हो गई। आज जब रति नाथ उस रात को याद करते हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं। वह एक निम्न-मध्यवर्ग परिवार में पले-बढ़े हैं और उनके पिता की एक जड़ी-बूटियों की दुकान है। बढ़ती आर्थिक तंगी की वजह से बीच में उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। अपने पिता के जड़ी- बूटियों के कारोबार में मदद करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। घंटों काम करने के बावजूद उनकी निःशक्तता उनके काम में बाधा बनती थी। एक जगह से दूसरे जगह आने-जाने में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ता था। शारीरिक निःशक्तता की वजह से उनका कारोबार और बिक्री पर भी बहुत असर पड़ रहा था। शैक्षिक योग्यता की कमी की वजह से कोई और काम भी उन्हें मिल नहीं पा रहा था। शारीरिक निःशक्तता से जुड़ी उनके अपमान और अवसाद की घटनाएँ भी उन्होंने हमें बताई। अपने गांव के आसपास के अलग-अलग इलाकों में आँखों में लगानेवाला सूरमा बेचने में भी उन्हें बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। पहले वह केवल एक या दो ही इलाके में जा पाते थे और वह भी भारी किराया खर्च के साथ। इससे परिवार की आय तो बढ़ी नहीं, उल्टे वह और गरीबी में चले गए। वह 2014 का साल था जब रति नाथ को राजीव गांधी संस्थापन की ओर से तिपहिया मोटर वाहन मिला। यह वाहन उनके जीवन के अंधेरे में उम्मीदों की रोशनी लेकर आया। रति नाथ ने उसी रोशनी में सफलता की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। चेहरे पर मुस्कुराहट और आंखों में संतोष लिए उन्होंने इस सहायता के लिए संस्थापन का आभार व्यक्त किया। अब वह कई गाँवों में आराम से जाते हैं और दूसरी जड़ी-बूटियों के साथ-साथ सूरमा भी बेचते हैं। उनकी रोज की आमदनी में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। पहले वह एक दिन में 150-200 रुपये ही कमा पाते थे, लेकिन अब स्कूटर की मदद से वह दिन में 300-400 कमा लेते हैं। आमदनी बढ़ने के अलावा अब रति नाथ समय में भी बहुत बचत होती है जिससे वह अपने समाज और पारिवार के साथ ज्यादा समय बिता पाते हैं।

रति नाथ

1980 में सुंदर लाल यादव हरियाणा के रेवाड़ी में स्वस्थ बालक के रूप में पैदा हुए था। लेकिन जब वह केवल 11 महीने के थे तभी वह और उनका परिवार एक भयानक दुर्घटना का शिकार हो गए। एक सीवेज पूल में वह लगभग डूब ही गए थे और थोड़ी देर के लिए उन्होंने सांस लेना भी बंद कर दिया था। होश आने पर पहले तो उन्हें तेज बुखार आया और उसके चलते उनके शरीर के अंगों में अकड़न आ गया। डॉक्टरों से दिखाने पर पता चला कि अब वह अपने पैरों का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। सुंदर लाल कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि यह दुर्घटना उनके चलने-फिरने की शक्ति छीन लेगा। अपने टूटी आवाज और नम आंखों से दुर्घटना के बाद की उनपर गुजरे कठिन हालातों का पता चलता था। निःशक्तता की वजह उनकी पढ़ाई और भविष्य के उनके सपनों को पूरा करने में भी समस्याएँ आ रही थीं। घर से कॉलेज पहुँचने में उन्हें 2-2.5 घंटे लग जाते थे। अपने हाथ-रिक्शे को हाथों से खींचने में उन्हें असहनीय पीड़ा होती थी। वर्ष 2010 में वह राजीव गांधी संस्थापन के किसी सदस्य की नज़र में आए जिन्होंने उन्हें सुझाव दिया कि वह संस्थापन की ओर से मिलनेवाली सहायता लेने का प्रयास करें। वर्ष 2013 में राजीव गांधी संस्थापन ने सुंदर लाल यादव के सपनों को पंख दे दी। यह ठीक ही कहा गया है कि जिसने पहले ही दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसे केवल एक मामूली हौसलाअफजाई की जरूरत होती है। संस्थापन ने सुंदर लाल के हौसलों को एक ऐसी ही उड़ान दे दी। स्कूटर मिलते ही सुंदर लाल का जीवन पूरी तरह बदल गया। उनके सारे सपने हकीकत में तब्दील होने शुरू हो गए। स्कूटर की मदद से सुंदर लाल ने अपने पोस्ट-ग्रेजुएशन पूरा किया और कंप्यूटर में डिप्लोमा भी हासिल किया। वाहन मिलने से उन्हें अपने लिए जिलाधिकारी कार्यालय से विक्रेता का लाइसेंस मिलना भी संभव हो सका। आजकल वह रेवाड़ी तहसील कार्यालय में स्टांप पेपर बेचने और लिखने का कार्य करते हैं। इस सबसे उनकी मासिक आय में 6,000 रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है। आर्थिक फायदों के अलावा स्कूटर ने उन्हें अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने में भी मदद की। उन्होंने बताय कि तहसील की सांस्कृतिक गतिविधियों में भी उनकी भागीदारी बढ़ी है। स्कूटर की मदद से वह सामाजिक कार्यों में भी अपना योगदान दे रहे हैं और लोगों के साथ घुलमिल भी रहे हैं। अपने समुदाय के प्रति उनके इस सामाजिक भावना की वजह से उन्हें अपने गाँव में पंचायत का सदस्य चुना गया है। जब उनसे पूछा गया कि वह किस उद्देश्य से पंचायत सदस्य बने हैं, तो उन्होंने कहा कि वह मुख्य रूप से शिक्षा और बिजली की व्यवस्था दुरुस्त करने पर काम करना चाहते हैं। स्कूटर की मदद से वह अपने गाँव के युवा क्लब में भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, जो पर्यावरणीय, सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर कार्य करती है। अज वह समाज के एक सक्रिय सदस्य के रूप में जाने जाते हैं और वह मानते हैं कि स्कूटर ने इस मुकाम को हासिल करने में उनकी बहुत मदद की है।

सुंदर लाल यादव