हमारे बारे में

श्री राजीव गांधी के बारे में



"विकास का अर्थ कारखाने, बांध और सड़कें नहीं हैं। विकास का अर्थ है लोगों का विकास। इसका लक्ष्य लोगों की भौतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संतुष्टि है। विकास में मानवीय पक्ष ही सबसे महत्वपूर्ण है।"



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संस्थापन के बारे में

राजीव गांधी संस्थापन (आरजीएफ) की स्थापना पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विज़न को पूरा करने के लिए 1991 में की गई थी। उन्होंने एक ऐसे आधुनिक भारत का सपना देखा था

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हमारी अध्यक्ष

श्रीमती सोनिया गांधी, राजीव गांधी संस्थापन की अध्यक्ष हैं। श्रीमती गांधी का जन्म 9 दिसंबर, 1946 को हुआ था। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने विदेशी भाषाओं के एक विद्यालय में दाखिला लिया,

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हमारी सीनियर प्रबंधन टीम

संस्थापन की सीनियर टीम बहुआयामी विषयों अनुभव रखने वाले लोगों से मिलकर बनी है, जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों, जैसे- संगठनात्मक नेतृत्व, कार्यक्रम प्रबंधन, वित्त और प्रशासन के क्षेत्रों में दशकों का अनुभव रहा है।

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हमारी कहानी

21 जून 1991 को स्थापित, फाउंडेशन पांच प्रमुख क्षेत्रों में अपना काम शुरू किया:

  • साक्षरता
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा
  • वंचितों और निःशक्तजनों का सशक्तिकरण
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हमारा बोर्ड

अपनी स्थापना के बाद से ही राजीव गांधी संस्थापन का संचालन जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विशाल अनुभव रखनेवाले प्रतिष्ठित नेतृत्व के हाथ में रहा है। वर्तमान बोर्ड 11 सुप्रसिद्ध सदस्यों से मिलकर बना है, जिसमें अध्यक्ष भी शामिल हैं।

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हमारी टीम

राजीव गांधी संस्थापन की टीम सही मायने में अनुभव और युवाओं के एक सही मिश्रण के साथ सामुदायिक भावना को साझा करती है। संस्थापन में ऐसे कार्य परिवेश को बढ़ावा दिया जाता है जहाँ कड़ी मेहनत, लगन और नवाचारों का सम्मान हो।

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25
गौरवशाली वर्ष
30
राज्यों और संघ शासित प्रदेश
500 +
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन हेतु संरचनाएँ
2900 +
बालिकाओं को विद्याज्ञान छात्रवृत्ति
2600 +
निःशक्तजनों को वाहन
2100 +
संघर्ष-प्रभावित बच्चों को छात्रवृत्ति
1600 +
पुस्तकालयों को सहयोग

सहभागी

राजीव गांधी संस्थापन ने देश के भीतर और बाहर के कई समानधर्मी संगठनों के साथ मजबूत और दीर्घकालिक साझेदारी स्थापित की है। बड़ी संख्या में दानदाताओं ने बहुत ही उदारतापूर्वक संस्थापन के प्रमुख कार्यक्रमों के कार्यान्वयन और विस्तार में सहायता की है। देश भर में फ़ील्ड स्तर के सहभागियों ने सबसे जरूरतमंद व्यक्तियों और परिवारों तक पहुँचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे कार्यक्रमों से संबंधित प्रक्रियाओं की उच्चतम गुणवत्ता और हमारे प्रयासों के प्रभाव का समुचित आकलन सुनिश्चित हुआ है।

हमसे जुड़ें

राजीव गांधी संस्थापन की ओर से चलाया जानेवाला हर कार्यक्रम ऐसे समय में व्यक्तियों और परिवारों की सहायता करते हैं जब उन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत होती है। इतने सालों के दौरान हजारों लाभार्थियों ने इसकी पुष्टि की है कि संस्थापन की सहायता की बदौलत उनके जीवन में परिवर्तनकारी और लगातार बने रहने वाले प्रभाव देखने को मिले हैं। लेकिन इतना भर पर्याप्त नहीं है। अभी भी ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको यदि थोड़ी सी भी सहायता मिले तो वे पीड़ा और संघर्ष भरे जीवन से आगे निकल कर प्रगति के रास्ते पर बढ़ सकते हैं। इस बदलाव को लाने में हमारा सहयोग करें।

हमें प्रेरित करनेवाली कहानियाँ

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हमारे साथ जुड़ें

थांगजम चानुलेंबी देवी का जन्म मणिपुर के इम्फाल में एक छोटे से कस्बे में हुआ था। वह केवल तीन वर्ष की थीं जब 12 अप्रैल, 1992 को कीसमपत में किसी अज्ञात बंदूकधारी ने गोली मारकर उसके पिता की हत्या कर दी। पिता की मृत्यु के साथ ही चानुलेंबी और उसकी माँ के जीवन में दुःखों का पहाड़ा टूट पड़ा। चानुलेंबी की माँ सत्यभामा देवी बहुत छोटी उम्र में ही विधवा हो गई थीं। अपना गुजारा करने और अपनी छोटी बेटी को पढ़ाने-लिखाने के लिए सत्यभामा ने कपड़ों पर कढ़ाई का काम शुरू किया। हालाँकि कढ़ाई से होनेवाली आय आजीविका चलाने के लिए पर्याप्त नहीं था। अपना गुजारा करने के लिए आजीविका कमाना दोनों ही माँ-बेटियों के लिए बहुत मुश्किल हो रहा था। लेकिन जब केडीएसओ ने लाभार्थी के रूप में उनकी पहचान की और चानुलेंबी की पढ़ाई का खर्च उठाने का आवेदन राजीव गांधी संस्थापन को भेजा तो इससे उन्हें बहुत राहत मिली। 1997 में संस्थापन में अपने ‘इंटरएक्ट’ छात्रवृत्ति के लिए उन्हें चुन लिया। चानुलेंबी तब एलकेजी कक्षा की छात्रा ही थीं। संस्थापन ने उनकी स्कूल फीस, पोशाक, किताबें और पढ़ाई से जुड़ी अन्य सभी ज़रूरतों का ख्याल रखा। 1997 में जब उनकी माँ को पहला चेक मिला तो खुशी से उनकी आँखें नम हो गईं। चानुलेंबी का दिमाग बहुत तेज और रचनात्मक है, जिसने उन्हें ऐसे मुश्किल दौर से उबरने में मदद की है। कढ़ाई के काम में दिन-रात कमरतोड़ मेहनत करने के बावजूद चानुलेंबी की माँ बहुत ही थोड़ा कमा पा रही थीं। उन्होंने अपने घर पर ही एक छोटी सी पान की दुकान चलाने की कोशिश भी की, लेकिन चरमपंथियों ने जर्दा और मीठा पान विक्रेताओं पर हमला बोल दिया और उनकी यह कोशिश भी कामयाब न हो सकी। अब उनके पास इसके सिवा कोई चारा न था कि वह इम्फाल में बेचे जाने के लिए सामान खरीदने बार-बार पास के एक शहर में जाएँ। जीविकोपार्जन के लिए जो लगातार संघर्ष माँ कर रही थी, उसका उल्टा असर नन्हीं सी चानुलेंबी की पढ़ाई और स्कूल जाने पर भी पड़ रहा था। जब उनकी माँ को सामान खरीदने के लिए दूसरा शहर जाना पड़ता, तो चानुलेंबी को दो-तीन दिनों तक किसी पड़ोसी या दोस्त के घर रहना पड़ता। इस स्थिति को संभालना माँ और बेटी दोनों के लिए ही बहुत मुश्किल हो रहा था। आखिरकार रिश्तेदारों और पड़ोसियों से सलाह-मशविरे के बाद चानुलेंबी को आठवीं कक्षा में शिलांग के सेंट सेवियर इंटरनेशनल स्कूल में भेजा गया। स्कूल के शिक्षक और अधिकारी चानुलेंबी के उत्साह और कड़ी मेहनत से बहुत प्रभावित हुए और बेहतर शिक्षा के लिए उन्हें केरल स्थित सेंट सेवियर इंटरनेशनल स्कूल में भेज दिया। इसी स्कूल से उन्होंने दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की है। आंध्र प्रदेश स्थित भारतीय विद्या भवन उन्होंने हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी की। अपनी रुचि को समझते हुए उन्होंने विवेकानंद कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला लिया और इंफॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी में बी.टेक. की डिग्री हासिल की। 2014 में जब वह घर लौटीं तो न केवल उनके पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी, बल्कि उनके चेहरे पर खुशी और आँखों में आशाओं की चमक भी थी। अपनी माँ के साथ काफी समय बिताकर 2015 में उन्होंने वापस बंगलोर का रुख किया। वहाँ उन्होंने ओमेगा हेल्थकेयर मैनेजमेंट सर्व्हिसेज में एआर सहयोगी के रूप में कार्य करना शुरू किया। आज उनकी आँखों में संतोष का एहसास साफ-साफ दिखाई देता है और उनकी मुस्कुराहट ‘इंटरएक्ट’ छात्रवृत्ति के प्रति कृतज्ञता की कहानी भी बयाँ करती है।

थांगजम चानुलेंबी देवी

एन. थम्बू सिंह और उनके तीन भाई-बहनों का जीवन पूरी तरह से तबाह हो गया, जब उनके पिता को विद्रोहियों ने मार डाला। इसे कोई दैवीय रचना कहें या भाग्य, इस मेधावी लड़के को राजीव गांधी संस्थापन ने पहचान लिया। थम्बू को संस्थापन के शिक्षा छात्रवृत्ति कार्यक्रम ‘इंटरएक्ट’ के तहत सहायता दी गई और उनका जीवन हमेशा के लिए बदल गया। जब वह महज कक्षा-1 में ही थे, तभी उन्हें संस्थापन द्वारा ग्रेटर नोएडा स्थित एग्नेल बाल भवन भेजा गयाI लेकिन उनके पिता की मृत्यु के दुःख से उनका परिवार उबर नहीं पाया और एक साल बाद ही उनकी माँ का भी देहांत हो गया। राजीव गांधी संस्थापन ने अनाथ बच्चों से कभी मुँह नहीं मोड़ा, बल्कि उन्हें हमेशा सहायता देने का संकल्प किया। थम्बू नोएडा में पले-बढ़े और चाहे खेल हो या पढ़ाई, हर क्षेत्र में अव्वल रहे। दिल्ली मैराथन में तो उन्होंने एक रिकॉर्ड बनाया और यहां तक ​​कि दिल्ली राज्य फुटबॉल टीम की कप्तानी भी की। हाई स्कूल पूरा करने के बाद उन्होंने पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी में होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की। संस्थापन ने तब भी इनकी सहायता करनी नहीं छोड़ी और उच्च शिक्षा के लिए दिए जानेवाले एक छात्रवृत्ति कार्यक्रम ‘इंटरएक्ट-II’ के तहत उनकी सहायता जारी रखी। केएफसी में प्रशिक्षु के रूप में काम करने के बाद वह ताज-विवांता होटल में अम्बैस्डेर बने। होटल मैनेजमेंट में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने ग्रेटर नोएडा स्थित क्राउन प्लाजा में कार्य करना शुरू किया। अपने गृहक्षेत्र में काम करने की इच्छा पूरी करने के लिए वह मणिपुर लौटे और क्लासिक ग्रुप ऑफ होटल्स में चीफ स्टीवर्ड के रूप में कार्य करना शुरू किया। दिल्ली आकर अपने रिश्तेदारों के साथ रहने के दौरान उन्हें केएफसी के पुराने दिन याद आने लगे और उन्होंने तुरंत ही वहाँ शिफ्ट मैनेजर के पद के लिए आवेदन कर दिया। अपना तबादला गुवाहाटी करवाने के बाद उन्होंने ज्यादातर समय अपने परिवार के साथ ही बिताया। वह एक पूर्ण सज्जन व्यक्ति के रूप में उभरे हैं और 18 अक्टूबर, 2015 को एक प्यारी महिला से उन्होंने विवाह किया। दीमापुर में वह अपने परिवार के साथ एक खुशनुमा और संतुष्ट जीवन बिता रहे हैं जो वह हमेशा से चाहते थे। आज वह एक अच्छा-खासा वेतन पाते हैं और घर लौटने पर अपनी प्यारी पत्नी का सान्निध्य पाते हैं। संस्थापन के साथ बातचीत में उन्होंने भविष्य में पर्यटन के क्षेत्र में काम करने की अपनी योजना बताई, जिसके माध्यम से वह जरूरतमंद लोगों की मदद करना चाहते हैं।

निंगथाऊजम थम्बू सिंह

गोवर्धना देवी के पिता तेलंगाना के वारंगल जिले में एक पुलिस कांस्टेबल थे। 7 अक्टूबर, 1996 को नक्सलियों के हमलें में उनकी मौत हो गई थी। उनके पिता की इस अप्रत्याशित मौत से पूरे परिवार को बड़ा सदमा लगा। उसके पिता न केवल अपना परिवार चलाते थे, बल्कि गोवर्धना के वृद्ध दादा-दादी का भी गुजर करते थे। उनेके पिता के इस अप्रत्याशित निधन ने उनके परिवार के लिए कई परेशानियाँ और मुश्किलें खड़ी कर दीं। गोवर्धना देवी के पिता परिवार की रीढ़ थे। उनकी अनुपस्थिति से परिवार मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से बिखर गया। ऐसे हालात में गोवर्धना देवी को एक ऐसी मदद मिली, जो इस दुःखद समय में उनके लिए एक राहत लेकर आया। राजीव गांधी संस्थापन के ‘इंटरएक्ट’ नाम की पहल के तहत पढ़ाई के लिए उन्हें छात्रवृत्ति दी गई। जब उन्हें उनका पहला चेक दिया गया तब वह कक्षा-I में थीं। उनके परिवार को जो चेक मिला उसकी अहमियत गोवर्धना के लिए दुनिया में किसी भी चीज से बढ़कर थी। इंटरएक्ट छात्रवृत्ति प्राथमिक शिक्षा पूरी करने में बहुत मददगार रही। अपनी 12वीं की परीक्षा उन्होंने 96% अंकों के साथ पास की, जो न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि संस्थापन के लिए भी एक गौरव की बात थी। आगे उन्होंने एम.बी.बी.एस. की परीक्षा भी पास की और भारत के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों में से एक हैदराबाद के गांधी मेडिकल कॉलेज में एक सीट हासिल की। यह राजीव गांधी संस्थापन की लगातार वित्तीय सहायता से ही संभव हो सका था। गोवर्धना ने बहुत खुश होकर हमें, "मैं आने वाले दिनों में एक डॉक्टर बनने जा रही हूँ और इसका सारा श्रेय राजीव गांधी संस्थापन को जाता है। इस मदद के लिए मेरा पूरा परिवार संस्थापन का आभारी है।" इतना ही नहीं, अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकार ने 1 जून, 1998 को उनकी माँ को पुलिस विभाग में एक क्लर्क के तौर पर नौकरी भी दी। इस छात्रवृत्ति ने उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने में मदद की और उनके सपनों को पंख दे दिए। इस छात्रवृत्ति में उनके कॉलेज की फीस, किताबें और पोशाक की लागत और पढ़ाई से जुड़े तमाम खर्च शामिल थे। गोवर्धना को दिल से ऐसा लगता है कि संस्थापन की इस बेशकीमती मदद ने इस इलाके के कई नक्सल प्रभावित परिवारों का हौसला बढ़ाया है। वह संस्थापन से यह अपील करती हैं कि जितना हो सके अधिक से अधिक परिवारों तक ऐसी मदद पहुँचाई जाए, ताकि सामाजिक, आर्थिक और मानसिक तौर पर उनके जीवन में बेहतरी आ सके।

गोवर्धना देवी

30-वर्षीय अमजद खान का जन्म 4 जुलाई, 1980 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में हुआ था। 1981 में वह नौ महीने के थे, जब वह पोलियो का शिकार हो गए। वाहन प्राप्त करने से पहले के अपने जीवन का अनुभव हमें बताते हुए वह एकबारगी स्तब्ध हो गए। उन्होंने कहा कि किस तरह एक स्थान से दूसरे स्थापन तक यात्रा के दौरान उन्हें सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ता था। उनके आसपास के लोग न केवल उनपर तरस खाते थे, बल्कि उन्हें हँसी का पात्र तक बना दिया था। यहाँ तक ​​कि एक बच्चे के तौर पर उन्हें अपने दैनिक कामकाज में कठिनाई का सामना करना पड़ता था। लेकिन गर्मी के महीने में एक ऐसा दिन भी आया जो अपने साथ अमजद के लिए बहुत सारी उम्मीदें और खुशियाँ लेकर आया। किसी तरह उन्हें राजीव गांधी संस्थापन के ‘एक्सेस टू ऑपॉर्च्यूनिटीज़’ कार्यक्रम के बारे में पता चला और इसके कुछ महीनों के भीतर ही वाहन उनके हाथों में था। यह तो उनकी आगामी उपलब्धियों की एक झलक भर थी। वाहन मिलने के बाद उन्होंने अपना एम.ए. पूरा किया। घर से कॉलेज के बीच की 20 किमी की दूरी का सफर अब आसानी से पूरी हो जाती थी। इस वाहन का सबसे बड़े फायदे के बारे में पूछे जाने पर वह गर्व से कहते हैं, "स्वायत्तता।" आज वह ह्यूमन एबिलिटी फाउंडेशन में सचिव के पद पर कार्यरत हैं। इसके अलावा वह स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (एसआईओ) के एक सदस्य भी हैं। साल भर पहले खुद के द्वारा शुरू किए गए एक ट्रस्ट के वे महासचिव भी हैं। इस ट्रस्ट के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने गर्व से इसके लक्ष्यों और उद्देश्यों के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य वंचित लोगों का उत्थान करना है। यह ट्रस्ट लोगों के बीच निःशक्तजनों के बारे में जागरूकता भी पैदा करता है। इसके अलावा अमजद 40-45 बच्चों को निःशुल्क पढ़ाते भी हैं। ऐसे माता-पिता जो अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते वे अपने बच्चों को अमजद खान द्वारा चलाए जानेवाले कक्षाओं में भेजते हैं। वह नोएडा स्थित नोडल एकेडमी स्कूल में एक शिक्षक के रूप में भी काम करते हैं।

अमजद खान

तीन-वर्षीय बच्चे रति नाथ के लिए 1993 एक मुश्किलों भरा साल था, जब उन्होंने एक बुखार में अपना पैर खो दिया। उनके परिवार ने कभी सोचा भी नहीं था कि महज एक बुखार उनके बेटे को चलने-फिरने में असमर्थ बना सकता है। डॉक्टरों के पास लगातार दौड़ना भी व्यर्थ साबित हुआ और इससे परिवार की आय भी कम हो गई। आज जब रति नाथ उस रात को याद करते हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं। वह एक निम्न-मध्यवर्ग परिवार में पले-बढ़े हैं और उनके पिता की एक जड़ी-बूटियों की दुकान है। बढ़ती आर्थिक तंगी की वजह से बीच में उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। अपने पिता के जड़ी- बूटियों के कारोबार में मदद करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। घंटों काम करने के बावजूद उनकी निःशक्तता उनके काम में बाधा बनती थी। एक जगह से दूसरे जगह आने-जाने में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ता था। शारीरिक निःशक्तता की वजह से उनका कारोबार और बिक्री पर भी बहुत असर पड़ रहा था। शैक्षिक योग्यता की कमी की वजह से कोई और काम भी उन्हें मिल नहीं पा रहा था। शारीरिक निःशक्तता से जुड़ी उनके अपमान और अवसाद की घटनाएँ भी उन्होंने हमें बताई। अपने गांव के आसपास के अलग-अलग इलाकों में आँखों में लगानेवाला सूरमा बेचने में भी उन्हें बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। पहले वह केवल एक या दो ही इलाके में जा पाते थे और वह भी भारी किराया खर्च के साथ। इससे परिवार की आय तो बढ़ी नहीं, उल्टे वह और गरीबी में चले गए। वह 2014 का साल था जब रति नाथ को राजीव गांधी संस्थापन की ओर से तिपहिया मोटर वाहन मिला। यह वाहन उनके जीवन के अंधेरे में उम्मीदों की रोशनी लेकर आया। रति नाथ ने उसी रोशनी में सफलता की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। चेहरे पर मुस्कुराहट और आंखों में संतोष लिए उन्होंने इस सहायता के लिए संस्थापन का आभार व्यक्त किया। अब वह कई गाँवों में आराम से जाते हैं और दूसरी जड़ी-बूटियों के साथ-साथ सूरमा भी बेचते हैं। उनकी रोज की आमदनी में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। पहले वह एक दिन में 150-200 रुपये ही कमा पाते थे, लेकिन अब स्कूटर की मदद से वह दिन में 300-400 कमा लेते हैं। आमदनी बढ़ने के अलावा अब रति नाथ समय में भी बहुत बचत होती है जिससे वह अपने समाज और पारिवार के साथ ज्यादा समय बिता पाते हैं।

रति नाथ

1980 में सुंदर लाल यादव हरियाणा के रेवाड़ी में स्वस्थ बालक के रूप में पैदा हुए था। लेकिन जब वह केवल 11 महीने के थे तभी वह और उनका परिवार एक भयानक दुर्घटना का शिकार हो गए। एक सीवेज पूल में वह लगभग डूब ही गए थे और थोड़ी देर के लिए उन्होंने सांस लेना भी बंद कर दिया था। होश आने पर पहले तो उन्हें तेज बुखार आया और उसके चलते उनके शरीर के अंगों में अकड़न आ गया। डॉक्टरों से दिखाने पर पता चला कि अब वह अपने पैरों का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। सुंदर लाल कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि यह दुर्घटना उनके चलने-फिरने की शक्ति छीन लेगा। अपने टूटी आवाज और नम आंखों से दुर्घटना के बाद की उनपर गुजरे कठिन हालातों का पता चलता था। निःशक्तता की वजह उनकी पढ़ाई और भविष्य के उनके सपनों को पूरा करने में भी समस्याएँ आ रही थीं। घर से कॉलेज पहुँचने में उन्हें 2-2.5 घंटे लग जाते थे। अपने हाथ-रिक्शे को हाथों से खींचने में उन्हें असहनीय पीड़ा होती थी। वर्ष 2010 में वह राजीव गांधी संस्थापन के किसी सदस्य की नज़र में आए जिन्होंने उन्हें सुझाव दिया कि वह संस्थापन की ओर से मिलनेवाली सहायता लेने का प्रयास करें। वर्ष 2013 में राजीव गांधी संस्थापन ने सुंदर लाल यादव के सपनों को पंख दे दी। यह ठीक ही कहा गया है कि जिसने पहले ही दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसे केवल एक मामूली हौसलाअफजाई की जरूरत होती है। संस्थापन ने सुंदर लाल के हौसलों को एक ऐसी ही उड़ान दे दी। स्कूटर मिलते ही सुंदर लाल का जीवन पूरी तरह बदल गया। उनके सारे सपने हकीकत में तब्दील होने शुरू हो गए। स्कूटर की मदद से सुंदर लाल ने अपने पोस्ट-ग्रेजुएशन पूरा किया और कंप्यूटर में डिप्लोमा भी हासिल किया। वाहन मिलने से उन्हें अपने लिए जिलाधिकारी कार्यालय से विक्रेता का लाइसेंस मिलना भी संभव हो सका। आजकल वह रेवाड़ी तहसील कार्यालय में स्टांप पेपर बेचने और लिखने का कार्य करते हैं। इस सबसे उनकी मासिक आय में 6,000 रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है। आर्थिक फायदों के अलावा स्कूटर ने उन्हें अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने में भी मदद की। उन्होंने बताय कि तहसील की सांस्कृतिक गतिविधियों में भी उनकी भागीदारी बढ़ी है। स्कूटर की मदद से वह सामाजिक कार्यों में भी अपना योगदान दे रहे हैं और लोगों के साथ घुलमिल भी रहे हैं। अपने समुदाय के प्रति उनके इस सामाजिक भावना की वजह से उन्हें अपने गाँव में पंचायत का सदस्य चुना गया है। जब उनसे पूछा गया कि वह किस उद्देश्य से पंचायत सदस्य बने हैं, तो उन्होंने कहा कि वह मुख्य रूप से शिक्षा और बिजली की व्यवस्था दुरुस्त करने पर काम करना चाहते हैं। स्कूटर की मदद से वह अपने गाँव के युवा क्लब में भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, जो पर्यावरणीय, सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर कार्य करती है। अज वह समाज के एक सक्रिय सदस्य के रूप में जाने जाते हैं और वह मानते हैं कि स्कूटर ने इस मुकाम को हासिल करने में उनकी बहुत मदद की है।

सुंदर लाल यादव

दीपक कुमार का जन्म 23 अक्टूबर, 2003 को सुरेश कुमार नाम के एक ऑटो चालक और फूल कुमारी के घर हुआ था। दीपक तीन भाई-बहन हैं जो 21-ए, जनपथ, नई दिल्ली में रहते हैं। वह कई सालों से नियमित रूप से वंडरूम आते रहे हैं। वह अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "मैंने अपने इलाके के कुछ बच्चों को कागज का मोर बनाते हुए देखा। बाद में, उन्होंने मुझे वंडरूम नाम के एक जगह के बारे में बताया जहाँ इस तरह की चीजें मुफ्त में सिखाई जाती हैं। नई चीजें सीखने की लालसा में उन्होंने वंडरूम में शामिल होने के लिए अपनी माँ से अनुमति मांगी। ज्यादा खर्च के डर से उनकी माँ ने इससे मना कर दिया। अगले दिन वह अपने दोस्तों के पास वापस गए और इसमें लगनेवाली फीस के बारे में पूछा। जब उन्हें पता चला कि इसमें कुछ भी पैसा नहीं लगता तो वे बहुत खुश हुए। दीपक के वंडरूम आने का एक उद्देश्य यह भी था कि वह स्कूल की कक्षाओं में पढ़ाए जानेवाली चीजों से कुछ आगे की चीज जानना चाहते थे। पूछने पर उन्होंने विज्ञान में अपनी रुचि के बारे में बताया। यह बताते हुए उनकी हँसी छूट जाती है कि घर की में बिजली की सर्किट ठीक करने में उन्हें महारत हासिल है। और यही कारण है कि वह वंडरूम में चलने वाले ‘फन साइंस’ के सत्रों में काफी दिलचस्पी लेते हैं। फन साइंस का संचालन करनेवाले अश्विनी सर के आस-पास रहना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। इन सत्रों ने उन्हें अपनी पढ़ाई और स्कूल प्रोजेक्ट्स में भी मदद की है। वंडरूम के बारे में अपनी और पसंदीदा चीजें पूछे जाने पर स्वभाव से शर्मीले दीपक कहते हैं, "फन सेशन्स के बीच-बीच में अश्विनी सर जो अजूबी चीजें बताते हैं उसमें बहुत मजा आता है।"वंडरूम में कबड्डी, खो-खो और ‘कुत्ते और हड्डी’ का खेल अपने दोस्तों के साथ खेलना भी उन्हें बहुत पसंद है। सलमान खान के एक बड़ा फैन होने की वजह से नाटक और डांस में भी वह हिस्सा लेते हैं। फिलहाल वह नई दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित नवयुग स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रहे हैं। अपने खाली समय में उन्हें ड्राइंग और पेंटिंग करना भी पसंद है। यहाँ तक ​​कि उन्हें पौराणिक किताबें पढ़ने का भी शौक है और उनकी पसंदीदा किताब रामायण है। मुस्कुराते हुए वह कहते हैं, "मुझे सबसे ज्यादा हनुमान-II पसंद है!"।

दीपक कुमार

नेहा का जन्म 13 दिसंबर, 2001 को एक टैक्सी चालक देवेंद्र कुमार और उनकी पत्नी लता कुमार के घर हुआ। उनका जन्म तो गाजियाबाद में हुआ था, लेकिन जल्द ही वे 21-ए, जनपथ, नई दिल्ली में आ बसे और उसके बाद से यहीं रह रहे हैं। तीन भाई-बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। वर्ष 2013 में उन्होंने वंडरूम आना शुरू किया और तब से नियमित रूप से आने लगी हैं। जब उन्हें पहली बार वंडरूम के बारे में पता चला था तो वह एक बहुत ही छोटी सी लड़की थीं। एक दिन कॉलोनी में कुछ दोस्तों के साथ खेल रही थीं, तो उन्होंने बच्चों को वंडरूम के बारे में बात करते हुए सुना। वह याद करते हुए कहती हैं, "दीदी एक ऐसी जगह के बारे में बात कर रही थीं, जहाँ सैकड़ों किताबें थीं और सीखने की भी हज़ारों बातें थी।" नई चीजें जानने की उत्सुकता और सारी पुस्तकें पढ़ जाने के उत्साह में वह अपनी माँ को वह सब कुछ बताने के लिए वापस अपने घर दौड़ीं जो उन्होंने वंडरूम के बारे में सुना था। एक गरीब परिवार से आने की वजह से उनकी माँ को एक तो इसकी फीस ज्यादा होने का डर हुआ, और फिर उन्हें इस जगह की विश्वसनीयता पर भी शक था। नेहा मुस्कुराते हुए कहती हैं कि आखिरकार एक दिन उनकी माँ खुद इस जगह की पड़ताल करने आईं। जैसा कि उन्हें उम्मीद थी, वंडरूम ने सहज ही उनकी माँ का भरोसा भी जीत लिया! और इस तरह हँसी, खुशी और सीखने का सिलसिला शुरू हुआ। नेहा की पहले से ही अभिनय में रुचि थी और वंडरूम ने उनकी प्रतिभा को और निखारना शुरू किया। वंडरूम में आयोजित नाटकों के दौरान उन्होंने अभिनय के बहुत सारे गुर सीखे। अपना पसंदीदा सत्र पूछे जाने पर भी वह उत्साह के साथ कहती हैं, "ड्रामा, और क्या!"। वह रजनीश बिष्ट की तारीफ करते नहीं थकतीं और उन्हें एक रोल मॉडल की तरह देखती हैं। रजनीश बिष्ट वंडरूम में नाटक सत्र का संचालन करते हैं। श्री बिष्ट की भरपूर प्रशंसा जारी रखते हुए वह कहती हैं, "मुझे उनका सेशन बहुत पसंद है। मैं उनकी छोटी से छोटी सलाह भी अपने अभिनय में अपनाने की कोशिश करती हूँ। वह एक अद्भुत अभिनेता और निर्देशक हैं!" नाटक सत्रों के अलावा, नेहा को वंडरूम में बैठकर इतिहास की किताबें, खासकर विश्वयुद्धों के बारे में पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। उन्हें पिक्चर-बुक्स पढ़ना भी बहुत पसंद है। उन्हें लगता है कि स्कूलों की पढ़ाई और वंडरूम की पढ़ाई में जमीन-आसमान का फर्क है। वह इतिहास की ही पढ़ाई की मिसाल देते हुए कहती हैं, "स्कूलों में इतिहास की कक्षाएँ नीरस और बोझिल होती हैं; जबकि वंडरूम में अश्विनी सर उसी बात को ज्यादा जीवंत तरीके से बताते हैं। नेहा वंडरूम को एक ऐसे खजाने के रूप में देखती हैं जहाँ बच्चों को अपना व्यक्तित्व निखारने का अवसर मिलता है। अपने स्कूल और पड़ोस के कई बच्चों को उन्हें वंडरूम से जुड़ने की सलाह दी है। कालोनियों और स्कूलों में उन्होंने वंडरूम के कार्यक्रमों के पोस्टर भी लगाए हैं। "बच्चों को वंडरूम से जुड़ना चाहिए, नहीं तो वे जरूर ही कुछ ऐसा मिस करेंगे जो उन्हें मिलना चाहिए।" अभी वह मंदिर मार्ग पर स्थित नवयुग स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ रही हैं और अपने खाली समय में थोड़ा अभिनय और डांस इत्यादि करना उन्हें बहुत अच्छा लगता है।

नेहा कश्यप

जूली का जन्म श्री पन्ना लाल और श्रीमती लालमणि देवी के घर 15 जून,1996 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता एक गरीब बुनकर थे जिनकी आय इतनी कम थी कि परिवार का गुजारा भी नहीं होता था। उनकी माँ एक नौकरानी के रूप में पास के एक स्कूल में काम करती थी जिससे उनके छोटे परिवार के गहरे वित्तीय संकट में कोई विशेष मदद नहीं मिल पाती थी। इसके चलते जूली की बड़ी बहन को पाँचवी कक्षा के बाद स्कूल छोड़नी पड़ी। इधर जूली भी बड़ी हो रही थी और साथ ही उनके भविष्य के संकट भी बढ़ रहे थे। परिवार की बिगड़ती वित्तीय स्थिति के कारण उनकी स्कूली पढ़ाई दाव पर लगी थी।

जैसा कि ऐसे बच्चों के साथ होता है, उनके पिता ने पाँचवी कक्षा के बाद उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए दबाव डाला। जूली बचपन से ही मेधावी और मेहनती छात्रा रही थीं। विज्ञान के सिद्धांतों और गणित के फार्मूलों में उनकी गहरी रुचि थी। वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं, लेकिन माता-पिता की आय बहुत कम होने की वजह से यह मुश्किल होता जा रहा था। लेकिन इसी दरम्यान विद्याज्ञान छात्रवृत्ति उनके लिए एक वरदान बनकर आया। जूली को जब इस छात्रवृत्ति के लिए चुना गया तब वह छठी कक्षा में थीं। छात्रवृत्ति मिलने के बाद अब उनके पिता के पास इसके सिवा अब कोई विकल्प नहीं था कि वह अपनी बेटी को पढाई पूरी करने दें। अब उन्हें अपना भविष्य साफ-साफ दिखाई दे रहा था और इससे वह बहुत खुश थीं। छात्रवृति में मिलनेवाले पैसे का इस्तेमाल जूली अपने स्कूल की फीस भरने और पोशाक और किताबें खरीदने के लिए करती हैं। वह कहती हैं, "छात्रवृत्ति मिलने से पहले स्कूल की फीस भरने में हमेशा देरी हो जाती थी, लेकिन अब यह समय दे दिया जाता है।" स्कूल के अलावा अब वह कोचिंग भी लेती हैं जहाँ गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और सामान्य ज्ञान सीखने से उन्हें अपनी पढ़ाई में मदद मिलती है। अपनी पढ़ाई में सहायता के लिए वह विद्याज्ञान छात्रवृत्ति की बहुत आभारी हैं और उनकी प्रबल इच्छा है कि वह आगे भी लगातार अपनी पढ़ाई जारी रखें।

जूली

मारिया वारसी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं और परिवार के लिए दो जून की रोटी भी उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं। मनुष्य अपनी बुनियादी जरूरतों- भोजन, वस्त्र और आवास पूरा करने के लिए कमाता है। इन जरूरतों को पूरा करने के बाद ही वे शिक्षा जैसी गौण चीजों में अपनी आय का निवेश करते हैं। लेकिन बाराबंकी जैसे छोटी जगहों में परिवारों की मानसिकता अभी भी यही है कि लड़की को पढ़ाना-लिखाना जरूरी नहीं है। मारिया के पिता मोहम्मद शफीक और माता सूफिया खान का रिश्ता तनावपूर्ण रहा और इसके चलते वे अलग-अलग रहते थे। मारिया और उसकी छोटी बहन अपनी माँ के साथ ही रहते थे। माँ को काम मिलता नहीं था, सो वह परिवार के लिए खाना भी मुश्किल से जुटा पाती थीं। अपनी माँ की इतनी कम आय और कुछ खास महीनों में ही काम मिल पाने की वजह से मारिया का पढ़ने-लिखने का सपना पूरा होता नहीं दीख रहा था। लेकिन उनकी माँ ठोस इरादे की थीं और उन्होंने पास के ही एक प्राइमरी स्कूल में उनका दाखिला करा दिया जहाँ उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की। पढ़ने और लिखने के प्रति उनके मन में बहुत उत्साह था। लेकिन पढ़ने-लिखने का उनका सपना टूटने के कगार पर आ गया जब परिवार की माली हालत इतनी खराब हो गई कि उनकी पढ़ाई का खर्च जुटाना मुश्किल हो गया। अब इसे इस नन्हीं सी लड़की का सौभाग्य कहें या किसी की दुआओं का असर कि उन्हें विद्याज्ञान छात्रवृत्ति के लिए चुन लिया गया। इस वज़ीफ़े के तहत उन्हें विभिन्न विषयों की निःशुल्क कोचिंग दी गई। इसके अलावा उन्हें अपने स्कूली खर्चों के लिए भी हर महीने 500 रुपये की सहायता अलग से दी गई। मारिया की माँ हमेशा ही अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित रहती थीं। लेकिन विद्याज्ञान के तहत मिलने वाले वज़ीफ़े ने मारिया के भविष्य के बारे में सोचने के लिए उनका हौसला बढ़ाया। इस छात्रवृत्ति ने मारिया के संकल्प को और दृढ़ कर दिया। अब मारिया भी अपनी पढ़ाई में अव्वल बनने के लिए कोचिंग और घर में अथक मेहनत करती हैं। वह अपनी कक्षा के सर्वश्रेष्ठ छात्रों में से एक है और उनके सहपाठी भी मदद के लिए उनकी ओर देखते हैं। वह खुद भी एक शिक्षक बनना चाहती हैं और वंचित बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना चाहती हैं। वह नहीं चाहतीं कि किसी भी बच्चे को पैसों की कमी की वजह से अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़े। अपनी बेटी के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए उनकी माँ ‘बेटी फाउंडेशन’ और राजीव गांधी संस्थापन की आभारी हैं।

मारिया वारसी

मैंने एक प्रशिक्षु के रूप में राजीव गांधी संस्थापन के साथ काम किया। हालाँकि संस्थापन की टीम के साथ मेरी यात्रा कुछ ही महीनों की थी, लेकिन मुझे वहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला। लोग, माहौल और कार्यस्थल बहुत ही शांतिपूर्ण और उत्साहजनक है। यह दूसरे एनजीओ से बहुत अलग है। राजीव गांधी संस्थापन ने मुझे कुछ ऐसे महान लोगों से मिलने का मौका दिया, जो शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं, लेकिन बहुत ही खुशीपूर्वक और इच्छाशक्ति के साथ अपना जीवन जी रहे हैं। संस्थापन की वजह से ही मुझे उनके जीवन के संघर्षों के बारे में पता चल सका।

मोहम्मद नबील

अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर के छात्र

दिल्ली विश्वविद्यालय

मैंने राजीव गांधी संस्थापन के कम्यूनिकेशन विंग में काम किया। किसी भी संगठन में इंटर्नशिप का यह मेरा सबसे अच्छा अनुभव रहा है। मेरा काम बहुत अच्छा था और मुझे कभी नहीं लगा कि मेरा शोषण किया जा रहा है! (जैसा कि अक्सर बहुत से इंटर्न के साथ होता है) इसके न्यूज़लेटर और नए वेबसाइट पर काम करने में मुझे बहुत आनंद आया; मेरी राय भी ली गई और उसे अहमियत दी गई। जहाँ तक इसके ​​कार्य-संस्कृति का संबंध है, तो यह न तो बहुत कठोर और न ही बहुत आरामदेह है। यह बिल्कुल संतुलित है। टीम ने बहुत ही गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। उन्होंने मुझे अपने परिवार के एक हिस्से के रूप में महसूस कराया। हर कोई एक साथ खाने का, एक साथ जन्मदिन मनाने का, और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर फिल्म प्रदर्शन करने का समय निकाल लेते हैं। और हाँ, मैं यह भी नहीं भुलूंगी कि मेरे इंटर्नशिप का सबसे पसंदीदा हिस्सा था अचानक कभी भी चाय के ब्रेक पर जाना, जहाँ हर कोई राजनीति और देश-दुनिया के मौजूदा घटनाओं पर चर्चा में मशगूल हो जाते! इस तरह एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जो सुस्ती भरा या उबाऊ हो। मुझे लगता है कि संस्थापन में आपसी बातचीत से सीखने की बहुत गुंजाइश है, और मैं बहुत भाग्यशाली रही कि इसका हिस्सा बनी।

सुकृति सोमवंशी

एमए (समाजशास्त्र)

डेलही स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स

आरजीएफ का समर कैंप सीखने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया से गुजरने का प्रयास करते हुए बच्चों के साथ मिलकर काम करने का एक अविश्वसनीय मंच था। कर्मचारियों और छात्रों, दोनों तरह के अद्भुत लोगों के साथ काम करने का एक सुंदर वातावरण मुझे यहाँ मिला। यह अनुभव मेरी शिक्षा को निखारने और उसे परिष्कृत करने में मददगार होगा। शुरू से आखिर तक यह मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव रहा।

अंकित शर्मा

वॉलंटियर

संस्थापन में बच्चों के साथ जो समय मैंने बिताया, वह अद्भुत था। हालांकि मैं उन्हें सिखाने के इरादे से वहाँ गया था, लेकिन हुआ इसका उल्टा? उल्टा उनसे ही मुझे बहुत सी चीजें सीखने को मिलीं। जीवन में खुशियाँ और अनुभव ही तो सब कुछ हैं, और जब आपके आसपास बच्चों से घिरे रहें तो ये खुशियाँ और अनुभव कई गुणा बढ़ जाते हैं। बच्चों में जो उत्साह होता है वह हमेशा आपको आगे बढ़ते रहने के लिए कहता है और यह बात मुझे हमेशा प्रेरित करती है। मैं वॉलंटियर के रूप में संस्थापन को अपना योगदान देते रहना चाहता हूँ क्योंकि वे एक बहुत ही व्यापक उद्देश्य के लिए काम कर रहे हैं। इसने मुझे जीवन के कुछ गौरवशाली पल दिए हैं जिन्हें मैं जीवन भर साथ लेकर चलूंगा। संस्थापन के मिशन और बच्चों के जीवन को हर दिन और अधिक अद्भुत बनाने के इसके प्रयासों में मैं इनकी सफलता की कामना करता हूँ।

 

राहुल वर्मा

वॉलंटियर, वंडरूम